Sunday, 27 April 2014

मैं सुन सकता हूँ तुम्हारी हर बात

मैं सुन सकता हूँ
तुम्हारी हर
वह आवाज !
जो शामिल रहती हैं
तुम्हारी प्रार्थनाओं मे। ……
तुम्हारे सपनों मे ……
मैं सुन सकता हूँ
तुम्हारी हर वह बात
जो मेरी अनुपस्थिति मे तुमने कहा था
दीवारों से ……
खिड़कियों से  ……
किताबों से ……
पानी से ……
बर्तनो से ……
मैं सुन सकता हूँ
तुम्हारी वह बात
जिसे सोचकर तुम कुछ देर के लिये रोते हो
या उस बात को जिसे तुम सोचकर चीनी जैसे मीठे होने की कोशिश करते हो
मैं सुनता हूँ तुम्हारी हर बात
 और स्वीकारता हूँ
तुम मेरे रूह की कोई रंग हो !


 

 

No comments:

Post a Comment