Monday, 17 February 2014

एक लड़की की चिट्ठी -7

कामरेड !
मैं तुम्हारे साथ रहते हुए सीखी थी
पेड़ो पर चढ़ना
और फल तोड़ना
मैं सीख ली
हँसुए से आसमान में छुपे हुए सपनों को हांसिल करना
मैं पहनना सीखी जींस के ऊपर कुर्ता
और पांव में टायर का चप्पल
इतना कुछ तुमसे सीखने के बाद माँ बहुत खुश थी
लेकिन बाबूजी कहते थे इसे घर से बाहर निकाल दो
नहीं तो कूल का नाश करेगी एक दिन
कामरेड !
मैं घर छोड़कर अपनी आँखों में बसी दूनिया को पाने के लिए
आ गई तुम्हारे शहर इलाहाबाद में
तब मुझे लगा कि
यहाँ गंगा और यमुना के संगम के अलावा
दो संस्क़ृतियों का भी संगम होता हैं । ।


Sunday, 16 February 2014

मैं सपनों को नहीं मार पाया

एक रात ऐसी भी थी
जब हम सपने पहनकर सोते थे
और आज एक ऐसी रात भी हैं
जब हम अपने सपनो को बचाने के
लिए करवट भी नहीं बदल पाते 

यह सोचकर
कि कहीं हमारे करवट बदलने से सपने घायल हो जाएँ
सपने सच नहीं हुए वह् दूसरी बात हैं
पर सबसे जरूरी हैं
अपने सपनो को बचाकर रखना |

अब हम  जागते हुए सपनों को देखना शुरू कर दिए 
अब शायद आपको खबर होगी 
मैं जागते हुए एक दिन 
मर गया 
पर सपनों को नहीं मार पाया । । 
नीतीश मिश्र

Saturday, 15 February 2014

एक लड़की कि चिट्ठी -6

कामरेड मैंने तुम्हारे साथ
रहते हुए सीखी थी
सपनो को सच करने के लिए जरूरी हो तो
तो हमें प्रतीकों से भी और परंपराओं से भी लड़ना होगा
कामरेड मैंने
तुम्हारे साथ रहते हुए सीखी थी
तोते का जूठे हुए फल को भी खाना
मैं सीखी थी
देवताओं से बेहतर उस इंसान की इबादत करो
जो तुम्हें सपना देखना सीखा सके
मै सीखी थी तुम्हारे साथ
जिंदगी को बचाने का नुस्खा सबसे बेहतर किताबों में होती हैं
मैं सीखी थी
जिंदगी सबसे ताकतवर भाषा उस समय गढ़ती हैं
जब अपनी जिंदगी अभावों के दरख्तो से गुजरती हैं ।

नीतीश मिश्र

Thursday, 13 February 2014

एक लड़की की चिट्ठी




कामरेड : याद  हैं तुम्हें
तुम मुझे पहली बार और पहली रात
कुछ ऐसे छुए थे
जैसे - एक फूल को कोई रंग छूता हैं
जैसे -बारिश ने और हवा ने
अब तक मेरे बदन को छुआ था
तुम्हारे आंच में
मैं कुछ देर के लिए एक भीगी लकड़ी सी हो गई थी ।
और दूसरे पल मेरे बदन से
नदी की सहस्रों धाराएं फूट पड़ी थी
मेरे आगे जो अब दुनिया थी
उसकी हुलिया मेरे सपनों से बहुत -कुछ मिलती जुलती थी
मैं पहली बार तुम्हारे साएं में
लड़की होने के दायित्वबोध से मुक्त हुई थी
जब मैं पहली बार देह और शर्म के गझिन व्याकरण से मुक्त हुई
तब मुझे अहसास हुआ कि
मैं एक रंग हूँ और एक हवा हूँ
और आकाश का एक ऐसा कोना हूँ
जहाँ तुम कुछ देर के लिए
अपने सूरज को मुक्त छोड़ सकते हो । ।

Wednesday, 12 February 2014

एक लड़की की चिट्ठी

कामरेड तुम्हें याद  हैं
जब मैं पहली बार
अपने बदन के अंधकार को उतारकर
तुम्हारे होंठ के दीये के नीचे आई थी
उस वक्त मेरे घर की दीवार बारिश से कांप रही थी
और घर के बाहर गेंहुअन पहरा दे रहा था
और आँगन में घूमता हुआ करैत खामोश था
शायद ! वह पीछे से मुझे डसना चाहता था
फिर भी मैं मेंढ़कों की टर्राहट और झींगुरो की ताल का सहारा लेकर
आगे बढ़ रही थी
मैं भूल गई थी
बांसवाड़ में रहने वाली चुरइ न  को
जिससे पूरा गांव डरता था
फिर भी मैं लाल सलाम का महामंत्र जाप करते हुए आई थी तुम्हारे घर
और तुम खा रहे भात  -चोखा
कामरेड तब
तुम मुझे बारिश की चादर ओढ़ाकर लिख रहे थे
अपने सिंद्धांतों का इंद्रधनुष
और मैं मूक थी तुम्हारे साये में दूब की  तरह ॥

नीतीश मिश्र

Tuesday, 11 February 2014

एक लड़की कि चिट्ठी --तीन

एक लड़की कि चिट्ठी --तीन
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कितने शर्म की  बात हैं कामरेड
तुम मेरे देश और समाज में रहकर भी
कभी मेरे नहीं हो पाएं
और मैं तुम्हारी तबसे हूँ
जब तुम मेरी गली से
लाल सलाम कहकर गुजरते थे
तुम्हारे मुंह से लाल सलाम सुनकर
मैं ,बाहर -और भीतर से एक पल के लिए लाल हो जाती थी
मेरा लहू मेरे पसीने से बाहर आकर
मेरे बदन के कहीं कोने में लिखता -रहता था
हर पल तुम्हारा नाम
तुम्हारे स्पर्श की छाया में
मैं जब भी आती थी
मेरे भीतर की लालिमा गुलमोहर की तरह चमकने लगती थी
और तुम्हारे स्पर्श के एक -एक शब्द को
मैं रात भर बैठकर अपने आईने में लिखती रहती थी ।

मैं जब कभी तुम्हारे छाया में आती थी
तुम मूर्तिकार की तरह मुझे खजुराहो से भी ज्यादा सुन्दर बनाते थे
उस वक्त यही लगता था की
मैं एक बांसुरी हूँ
और तुम उसमे सुर हो
यह तो मुझे बहुत बाद में पता चला की
तुम मेरी बांसुरी में अपनी कला का सुर नहीं
बल्कि अपने संघर्षो की छाया खोजते रहते थे ।

कामरेड मैं आज भी वहीँ खड़ी हूँ
जहाँ तुम मुझे छूकर लाल सलाम कहा करते थे
उस जगह मैं रोज खोजती -रहती हूँ अपनी टूटी हुई यादें
क्या कामरेड मैं कभी तुम्हारे सपनो में भी आती हूँ कि  नहीं !

Monday, 10 February 2014

एक लड़की की चिट्ठी-1

एक लड़की की चिट्ठी-1
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कामरेड जब तुम रोटी को रोटी कहते हो तो
तुमसे बहुत प्यार करने को मन करता हैं
कामरेड: जब तुम टूटे हुए अपने सपनो को जोड़ते हो मुझे यही लगता हैं की तुम मेरा साथ कभी नहीं छोडोगे
कामरेड मैं जबसे तुमसे जुड़ी हूँ
मैने सही से अपनी दुनिया को पहचानने का एक नज़रिया पाया हैं
और मैं दावे के साथ कह सकती हूँ
की एक कामरेड से प्यार करके मैने कोई ग़लती नहीं की हैं
लेकिन कामरेड जब मैं तुमसे पूछती हूँ की प्यार क्या होता हैं
मेरे इस प्रश्न को सुनकर तुम वर्षो तक खामोश हो जाते हो
अगर तुम मेरे प्रश्न का उत्तर नही दे पा रहे हो तो तुमसे प्यार करने के नाते मुझे ही इस प्रश्न का उत्तर देना होगा
एक कामरेड के लिए प्यार रिक्त स्थानो की पूर्ति के सिवाय और कुछ नहीं हैं
मुझे माफ़ करना कामरेड
लेकिन मैं अभी भी इंतजार कर रही हूँ
जब क्रांति शायद ख़त्म हो जाए
तब तुम्हें प्यार का माने अगर समझ मे आ जाए तो मेरे शहर मे आ जाना
प्यार का अर्थ जमाने को समझाने के लिए ||

नीतीश मिश्र

एक लड़की की चिट्ठी

एक लड़की की  चिट्ठी
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कामरेड : मैं कितनी अभागिन लड़की हूँ
कामरेड : तुम बाएं हाथ से कब -तक मुझे प्यार करते रोहेगे
जबकि तुम जानते हो
मेरे बदन की सीमा असीमित हैं
और तुम्हारे बाएं हाथ की एक तयशुदा सीमा हैं ।
तुम शायद ! दाहिने हाथ से मुझे एक बार छू लो
मैं तुम्हारे चेहरे की लाल रंग बन जाउंगी
लेकिन ! मैं क्या करूँ
तुम कुरुक्षेत्र के सिर्फ एक भीष्मपितामह हो
जो सिर्फ अपनी शर्तो पर जीना जानते हो
और अपनी शर्तो पर मरना
और तुम्हारे इन्हीं हथियार से कितने बेगुनाह लड़कियां मरती हैं
क्या कभी उन मौतों का पोस्टमार्टम रिपोर्ट
तुम अपने सिंद्धांतों में चस्पा करते हो ।

कामरेड तुम -कब तक
मेरे समाज और देश को
अपने बाएं हाथ और बाएं पैर से नापते रहोगे
जबकि तुमलोग भी आईने के पीछे
मंत्रोच्चार करते हुए पाए गए हो कि
तुम्हारा लाल सिंदूर सिंगुर में ही खो गया हैं
बोलो कामरेड------
मैं तुमसे प्यार करके
न तो घर कि रही और न ही तुम्हारी
क्योकि तुमने मुझे अभी दाहिने हाथ से प्यार नहीं किया
तुम जानते हो कामरेड
मेरा घर गली के दाहिने और ही पड़ता था
और तुम अपने दाहिने पैर से चलकर मेरे घर कभी नहीं आ सकते थे
इसलिए मैंने अपना परम्परागत घर छोड़कर
तुम्हारे पीछे चली आई ॥

नीतीश मिश्र