Saturday, 26 January 2013

मंदिर जाते हुए

जब -जब मंदिर की
घंटियाँ बजाता रहा
लगा कि
हर बार हाथ में
एक नयी चूड़ियाँ पहनता रहा
जब -जब गीता/मानस वांचता रहा
मेरे पायजामे का नाड़ा मोटा होता रहा,
जब -कभी धुप -नैवेध्य चढ़ाकर
प्रतिमा के सामने झुकता रहा
मेरी आँखों में आभा की जगह
नपुंसकता का लेंस चढ़ता रहा,
जब -कभी मंदिर की परिक्रमा करता रहा
अन्दर ही अन्दर
व्यक्ति से व्यक्तिगत होता रहा।
और जब -कभी
पत्थर पर दूध का दान करता रहा
ऐसा लगता रहा कि
मैं किसी बछड़े के
पुरुषार्थ की हत्या करता रहा,
जब -कभी मंदिर से लौटकर
घर जाता रहा
अपने विवेक को जुते की तरह फेककर
किसी शहर की हत्या करता रहा
जब -जब मंदिर जाता रहा
नैतिकता के हथियार से
एक आदमी की हत्या करता रहा ....।।

नीतीश मिश्र

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