Wednesday, 16 January 2013

ना हिन्दू ना मुसलमान .

जबसे मैं बायें
और दायें मार्ग का
मर्म समझने लगा हूँ
दुनियाँ की निगाहे
मेरे प्रति बहुत ही
चौकन्नी हो गयी हैं
क्योकि दुनियाँ को
पहले ही खतरे का
एहसास हो गया हैं कि
उनका एक वोट ......
कहीं कम ना हो जाये ।

न तो मैं बायें चलता हूँ
और न ही दायें चलता हूँ
क्योकि दोनों और ही चलने पर
व्यवस्था की चाकी में
आदमी ही पीसता रहता हैं
और सदियों से ही
पीसता हुआ चला आ रहा हैं ...........

यहाँ बाज़ार में पीसे हुए
गेंहूँ के आटे का दाम तो तय हैं
पर पीसे हुए आदमी का
चवन्नी भी मोल नहीं हैं .....
और जबसे उदारीकरण नाम की
नयी देवी आयी हैं
तबसे तो ...
पहचान ही नहीं पाता हूँ कि
दायें रास्ते की मंजिल कहाँ हैं
और बायें रास्ते का लक्ष्य क्या हैं?
सबकी अपनी -अपनी दुकान हैं
और सबके अपने व्याकरण हैं
सब बाजार में बैठे
अपने उत्पाद को बेहतर
और बेहतर बनाने की फिराक़ में
देश को रंडी बना बैठे हैं ।

जब मैं,धरती पर पाँव रखा था
बहुत ही खुश था
क्योकि मेरी आँखों में एक दुनियाँ थी
और बाबूजी के हाथों में
मेहनत का हूनर था
मैं अपने शर्ट की जेब में
खुशियाँ बटोरकर
हवा पर दौड़ता हुआ खुश था
पर मुझे क्या पता था कि
खुशियाँ जीवन में कपूर की तरह होती हैं।
जबसे मेरी देह में
जवानी का झरना फूटना शुरू हुआ
मेरे जिस्म के हर हिस्से से
नीम की खुशबू झरने लगी

ऐसे कठिन समय में
नैतिक शिक्षा का कंडोम भी
किसी काम में नहीं आया
जवानी के किस्से
पुस की रात का परवाह कीये बगैर
बढ़ती गयी ........
ऐसे में मैंने किया प्यार
और एक असफल प्यार से
खुद को निर्दोष साबित करने के लिए
कवि बन गया
वह भी ऐसा कवि जो अपनी रचना से
न तो देश को बना सकता हैं
और न ही खुद को,

माँ -बाबूजी खांस -खांस कर गरियाते
कि "कविता करने से
जीवन का चोला नहीं चलता"
लेकिन मैंने उनकी एक न सुनी
और रात -दिन चोले की सीमा
नापंते -नापंते
मैं पूरी धरती नांप लिया
पर इंसानों के चोले का
सही नांप आज तक नहीं ले पाया।

मैं समझ गया कि
धरती पर सबसे बड़ा
चूतिया मैं ही हूँ ......
क्योकि अगर कायदे से
मैं,ब्राहमण भी बन गया होता तो
अपनी कई पीढ़ियों का कल्याण कर
दिया होता .....
लोक -परलोक भी ठीक कर लिया होता
लेकिन अफ़सोस!की मैं ब्राहमण भी नहीं बन पाया
क्योकि आदमी बनने का हूनर
बाबूजी ने ही लगा दिया था
तबसे आज तक व्यवस्था की चाकी में
पीस रहा हूँ,वह भी बीना मोल के ......


देह में पहले जैसा दम नहीं रहा
लेकिन दिमाग करैले की तरह
आज भी हरा हैं।
एक दिन:काशी से कबीर का बुलावा आ गया
और मैं चल दिया कबीर से मिलने
कबीर पैदल ही पूरा काशी का चक्कर लगाकर
लंका में एक चाय की दुकान में बैठ गए
और मेरा हाथ पकड़ कर कहने लगे कि
दिमाग मत ख़राब करों
इस देस का कुछ नहीं होने वाला
"मैंने क्या इस देस को बचाने के लिए
किसी से कम काम किया था
लेकिन क्या हुआ ?
फिर कबीर जोर -जोर से हँसने लगे
और कहने लगे ......
क्या करोगे जो आदमी बनकर पैदा होता हैं
वह आदमी की तरह रह नहीं पाता हैं
तुम परेशान इसलिए हो क्योकि
तुम मेरी तरह एक आदमी हो,
कबीर कहने लगे लगावों आग
क्या पता एक आदमी तुम्हें और मील जायें
इतना कहकर कबीर मगहर चले गये
तबसे मैं दुनियां में एक आग लगाकर कहता हूँ
ना हिन्दू ना मुसलमान ..............

नीतीश मिश्र     17.01.2013



1 comment:

  1. यहाँ बाज़ार में पीसे हुए
    गेंहूँ के आटे का दाम तो तय हैं
    पर पीसे हुए आदमी का
    चवन्नी भी मोल नहीं हैं .....
    और जबसे उदारीकरण नाम की
    नयी देवी आयी हैं
    तबसे तो ...
    पहचान ही नहीं पाता हूँ कि
    दायें रास्ते की मंजिल कहाँ हैं
    और बायें रास्ते का लक्ष्य क्या हैं?
    सबकी अपनी -अपनी दुकान हैं
    और सबके अपने व्याकरण हैं
    सब बाजार में बैठे
    अपने उत्पाद को बेहतर
    और बेहतर बनाने की फिराक़ में
    देश को रंडी बना बैठे हैं ।.................kya kahun ab iske bare mei ....aaj ke vakt ke mutabik ek dam sahi likha hai ...bahut khub

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