Thursday, 24 January 2013

मैं कहाँ नहीं हूँ

तुम मुझे छूकर तो देखों कि
मैं कहाँ नहीं हूँ .....
तुम्हारे रात के देखे हुए सपनों में हूँ
जहाँ तुम पुरी तरह आजाद रहती हो,
सुबह --सुबह खुलती हुई
तुम्हारे आँखों के दरार में हूँ
जहाँ तुम मुझे
थककर कैद कर लेती हो
और अपने जीवन का ज्वलंत इतिहास समझकर
पुरी रात सांसों की आंच में गुनती रहती हो ।

मैं तुम्हारे मेज पर रखी हुई
टेबल घड़ी के सही वक्त में हूँ
जिसके सहारे तुम हर रोज जीने की
एक नयी कोशिश करती हो
तुम मुझे छूकर तो देखो की
मैं कहाँ नहीं हूँ .....
मैं,तुम्हारे रोज के दैनिक कार्यों में हूँ
जब तुम अपने पड़ोसियों के अच्छे
सामानों को देखकर ललचती हो
तब उस लालच में /ख़ामोशी में
मैं तुम्हारे साथ रहता हूँ ....।
सुबह --सुबह जब तुम एकांत में
गैस पर चाय का पानी चढ़ाती हो
पानी के गुनगुनाते बुलबुलों में
छुपी रहती हैं मेरी शरारतों की ढेर सारी शक्लें
तुम चाय में चीनी
कभी चम्मच से नांपकर नहीं डालती हो
फिर भी चाय तुम्हारे हाथ की
कभी फीकी नहीं होती
जानती हो क्यों ?
क्योकि तुम्हारे अनुमान में
मेरी परछाई समाई रहती हैं ।

तुम जैसे -खुद को जतन से
संभालकर कर रखती हो
उसी आत्मविश्वास से घर/कमरे को
तुम्हारी इस कला में
कहीं न कहीं मेरे अनुभव की
उपस्थिति रहती हैं ....
तुम,जब बाज़ार में खड़ी होकर
अपने पसंद/नापसंद
प्रतिमाएं रचने लगती हो
तब भी मैं तुम्हारे चुनाव की
कला में रहता हूँ


जब तुम शाम को शर्म से मौन होकर
सुने से आकाश में कुछ देर के लिए
बादलो में छुपना चाहती हो
तुम्हारी इस मुक्ति में भी
कहीं न कहीं मैं तुम्हारे साथ रहता हूँ
मैं,आकाश के उस नीले दरिया में भी हूँ
जहाँ तुम्हारी नज़रे एक पल के लिए भींग जाती हैं
मैं तुम्हारे बिस्तर के रंग -बिरंगे फूलों में भी हूँ ।

जब तुम धन के अभाव में
कुछ देर के लिए परेशान होती हो
तब मैं संतोष की आभा लिए
तुम्हारे बहुत पास आ जाता हूँ
मैं तुम्हारी आलमारी में रखी हुई
किताब के ऊपर
धूल की तरह जमा भी हूँ
मैं,तुम्हारी अँगुलियों के नाखुन में भी हूँ
मैं,बारिश के बूंद में भी हूँ
जिसे तुम अंजुरियों में भरकर एक संस्कार देती हो,
जब तुम ठण्ड से डरकर
अपने बदन को दोहरा करने लगती हो
तब मैं ऊष्मा बनकर
तुम्हारी त्वचा के बीच सिमट जाता हूँ
जब तुम अन्याय से लड़ती हो
तब मैं साहश बनकर
तुम्हारे बहुत पास आ जाता हूँ ....
मैं तुम्हारे साथ हर जगह/हर मोड़ पर रहता हूँ
यह अलग बात हैं की
मैं कोई देवता नहीं हूँ
जो तुम्हें समस्याओं से मुक्त कर दूँ
मैं एक कला भर हूँ
इसलिए मैं एक कला की तरह ही
हर क्षण तुम्हारे साथ रहता हूँ
तुम मुझे छूकर तो देखों कि
मैं कहाँ नहीं हूँ .............।।।


नीतीश मिश्र


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