Tuesday, 13 May 2014

लड़कियां चुप हैं जबसे आँगन का आसमान नीला हैं

लड़कियां चुप हैं
उदास हैं .......
और रो रही हैं
दुनियां की पंक्ति में
सबसे पीछे खड़ी हैं
लड़कियां चुप हैं
जबसे तुम्हारे आँगन का आसमान नीला हैं ।
लड़कियां रो रही हैं
जबसे तुम घर मे बिस्तर लगाकर
संजय की तरह कुरुक्षेत्र की घटनाओं को
देखना शुरू कर दिए ।
लड़कियां चुप हैं
तुम्हारे देवताओं की तरह
लड़कियां चुप हैं सीता की तरह
द्रोपदी की तरह
लड़कियां बोलना शुरु करेगी तो
टूट जाएगी सैंधव सभ्यता की दीवारे ।
हम कैसे समय मे जी रहे हैं ?
जहाँ अन्धो को मिल जाती हैं कुर्सियां
लंगड़ों को मिल जाती हैं मंजिले
और कुत्तों को मिल जाती हैं पहचान
लड़कियां चुप हैं
जैसे चुप हैं घर का चौखट
जैसे चुप रेलवे लाइन की पटरियां
लड़कियां कब - तक चुप रहेंगी
जब तक पुरूषों के पास
हाथ / पांव और आँखे रहेंगी ॥

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