Sunday, 10 May 2015

मैं नहीं जा पाता हूं मां के पास

मैं नहीं जा पाता हूं
अपनी मां के पास
जब भी किसी रास्ते पर पांव रखता हूं
गुजरात पहुंच जाता हूं या फिर अयोध्या
हर बार लगता था कि
मैं किसी गलत रास्ते पर आ गया हूं
लेकिन जब दूसरे के साथ जाता हूं
गुजरात या बनारस पहुंच जाता हूं
दुनिया में कोई ऐसा रास्ता अब शायद नहीं है
जिस पर चलते हुए मैं अपने घर पहुंच सकूं
क्योंकि अब सारे रास्ते उन्हीं के घर की ओर जाते है।
मैं यहां से देख रहा हूं
या तो पुरी दुनिया गुजरात हो रही है
या फिर अयोध्या या फिर काशी
मैं सपनों में भी नहीं देख पाता हूं अपने घर का रास्ता
क्या अब दुनिया ऐसे ही लोग रहेंगे
जो केवल अपने घर के लिए रास्ते बनाएगें।
मैं यहां से देखता हूं
अब सारी हवाएं गुजरात में बहती है
अब सारी धूप बनारस में खिलती है
सारा वसंत दिल्ली मेंं चमकता है
सारी बरसात अब मथुरा में होती है।
मैं नहीं जा पाता हूं
अपने घर
जहां से मैं देख सकूं
कि मैं जिंदा हूं या मेरे सपने।।

नीतीश मिश्र

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