Monday, 18 May 2015

क्या तुम जानते हो शहर कराह रहा है

क्या तुम्हें मालूम है
जिस शहर में  तुम रहते हो
वह रात भर कराहता है
जब तुम वर्तमान से थकरकर सो जाते हो
जलकुंभी की तरह
उस समय शहर जागता है
और अपने घायल चेहरें को तुम्हारे आईने में देखता है।
और सोचता है तुम उसे किस हथियार से मारे हो कि जख्म आज- तक नहीं भर पा रहा है
यहां तक शहर के सबसे पुराने और बुर्जुग देवता भी शहर के जख्म को आज - तक नहीं भर पाए
ऐसे में अब ये शहर तुमसे डरने लगा है।
जानते हो !
शहर तुमसे पहली बार कब डरा था
जब तुम हाथ में पत्थर उठाकर तालाब में फेंके थे
उसी दिन शहर को आभास हो गया था कि जिसे मैंने अपने छांव में रखा है वहीं एक दिन मेरी हत्या करेगा।
अब शहर रात भर बांसुरी की तरह बजता रहता है
लेकिन यह अलग बात है कि शहर का बजना किसी को सुनाई नहीं देता है
क्या हम शहर को कभी लौटा सकते है उसका पुराना वह चेहरा जिसमे शहर सबसे खूबसूरत दिखाई देता था?
 शहर धीरे- धीरे हमे छोड़कर जा रहा है
क्या तुम्हे पता है
जब तुम रहोगे और शहर नहीं रहेगा।
शहर एक दिन चला जाएगा
ठीक उसी तरह जिस तरह शहर से चली गई कई सारी लड़किया।।
नीतीश मिश्र

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