Monday, 20 May 2013

मेरी आस्था की लौ

तुम आती हो ...
और एक एहसास बनकर 
मेरे दिल की केतली में 
उबलने लगती हो ......

और मैं तुम्हें अपनी सांसों की डोरी में बांधकर 
तुम्हारे देह के आकाश पर 
अपनी अनंत संभावनाओं को 
रंगने लगता हूँ 
यह सोचकर अब तुम्हारी संगत में मेरी मुक्ति हैं ........

इसी बीच इस तरह के सपने 
धूप में सुखकर 
मुझे डूबते हुए सूरज के पास खड़ा कर देते हैं 

पता नहीं क्यों मुझे लगता हैं कि मैं 
कहीं काशी में तो नहीं मर रहा हूँ .......
तभी मेरे कदमों की आँखे बादलों का साथ पकड़कर कर 
मुझे सूने से पहाड़ पर लेकर चले जाते हैं ...
जहाँ मेरे सपने एक रंग की तरह महकते हुए 
वर्षों से मेरे इंतजार में 
एक लम्बी संगीत की श्रंखला को सजाएँ हुए हैं .....
इन्ही पहाड़ियों के झरोखों से मुझे लगातार कोई 
बुला रहा हैं .....
उसका चेहरा और उसकी आवाज बिल्कुल जानी पहचानी सी लगती हैं .....

तभी सोया हुआ तालाब जाग जाता हैं 
और कहता हैं 
मैं कबसे बुला रहा था रक्ताभ पुरुष 
कहाँ थे तुम इतने दिन 
मैं कब तक तुम्हारी हरेक संभावनाओं को 
बचाकर रखता ......
इसी बीच चाँदनी के बीच से एक 
आवाज मुझे मेरा नाम लेकर बुलाती हैं 
आओं ...मैं ही तुम्हारी संगीत हूँ 
मैं ही तुम्हारी सफ़र हूँ ....
ये आवाज सपनों से बिल्कुल मिलता --जुलता सा लगता हैं ....

पहाड़ मेरे हर अभव्यक्ति को बचाकर रखे हुए हैं .....
मैं आज खुश हूँ ....
मेरी आस्था की लौ 
पहाड़ों में चाँदनी की तरह चमक रही हैं ....
पहाड़ में डूबता हुआ सूरज जितना सुन्दर लगता हैं 
ठीक उसी तरह पहाड़ में मेरा प्यार भी सुन्दर लगता हैं ........




1 comment:

  1. विचारों की सहज उथल-पथल ..बहुत खूब

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