Monday, 23 February 2015

बुनकरों ने घोषित किया हैं

बुनकरों को पहले ही मालूम हो गया था
आने वाली सदी में
नहीं दिखाई देंगे
कहीं फूल....
कहीं पत्तियां....
कहीं झरने
कहीं हिरन तो कही जंगल ....
बुनकरों को अंदाजा हो गया था
मनुष्य ही करेगा अपनी सभ्यता की हत्या !
इसलिए उन्होंने कपास के धागे में रफू किया था
कोई फूल , कोई झरना ,  कोई पेड़
बुनकरों ने बुना था धागे में हमारे लिए एक विशेषण
हत्यारे का ! हत्यारे का !
आज हमें एहसास   न हो लेकिन बुनकरों ने पहले ही घोषित का दिया था
हम इस सभ्यता के एक हत्यारे हैं !
आज मैं जब भी अपनी कमीज पर कोई रफू किया हुआ फूल देखता हूँ
मुझे फूल में बुनकरों की आँख दिखाई देती हैं
जो कहती हैं तुम कमीज नहीं
प्रकृति की हत्या करके उसकी आत्मा पहने हो ॥

नीतीश मिश्र

Monday, 12 January 2015

माँ के बाद

माँ के बाद ....
मेरा कोई कुशल क्षेम चाहता हैं
या मेरे भविष्य के लिए चिंतन करता हैं
तो वह हैं ----
मेरे कमरे की दीवारे
खिड़कियां ……
और मेरे जूते -चप्पल
मेरी तौलियां …।
मेरी माँ के बाद कोई मेरा रास्ता देखता हैं
तो वह हैं ……
वह हैं मेरे कमरे में रखी कुर्सियां
दीवारो पर रखा  हुआ आईना
और ताखे पर रखी हुई लालटेन ।
माँ के बाद कोई मुझसे बात करता हैं
तो वह हैं …
झाड़ू
चूल्हा …
बर्तन
माँ के बाद कोई मेरा बोझ ढोता हैं
तो वह हैं कमरे में रखा हुआ मेज ॥

नीतीश  मिश्र

Wednesday, 7 January 2015

मैं आज सुन्दर इसलिए हूँ

अब मैं सपना बहुत खूबसूरत देखता हूँ ....
जंगलों में भी एक नया रास्ता बना लेता हूँ
अजनबी शहरों में भी
अपना कोई न कोई परिचय निकाल  लेता हूँ....
हामिद और मकालू में भी
अपना चेहरा ढूंड लेता हूँ
मंदिर / मस्जिद से अलग होकर
अपना एक मकान  बना लेता हूँ …
क्योकि मेरी माँ बुढडी हो गई हैं ।
मैं अब गहरे पानी में तैर लेता हूँ
क्योकि माँ के चेहरे पर अब पसीने नहीं आते
अब मैं हँसना भी सीख लिया हूँ
अब मुझे कोई बीमारी भी नहीं होती
क्योंकि माँ के शरीर में
जगह -जगह जख्मों ने सुरक्षित स्थान बना लिया हैं
मेरी माँ उम्र के अंतिम सीढ़ियों पर खड़ी हैं
और मैं सुन्दर हो गया हूँ ……

एक दिन शहर के बीचो बीच
मुझे एक डॉक्टर ने रोक लिया
और धिक्कारते हुए मुझसे कहता हैं
तुम होशियार और सुन्दर इसलिए बने हो
क्योंकि कहीं बहुत दूर खटिये पर तुम्हारी माँ खांस रही हैं ॥

नीतीश  मिश्र

Sunday, 2 November 2014

चलो कुछ बन जाते हैं

चलो तुम कुदाल बन जाओ
और मैं मिट्टी …
तुम खोदो मुझे परत दर परत
और छिपा के रख दो अपना संघर्ष .......
एक समय के बाद
तुम्हारा संघर्ष
अविराम विरोध की आवाज बन जायेगा आकाश के नीचे !
चलो मैं फूल बन जाता हूँ
और तुम रंग .......
ऐसे में हम एक हो जायेंगे
और कभी साख से टूटे तो एक दूसरे का साथ न छूटे
चलो तुम नदी बन जाओ
और मैं नाँव
और चलता रहे सूर्यास्त के बाद भी हमारा कारोबार !
चलो तुम अँधेरा बन जाओं
और मैं उजाला
जिससे मैं उत्तर सकूँ तुम्हारी अस्थियों में .......
चलो तुम सृष्टि बन जाओं
और मैं पहरेदार .......
चलो तुम पर्स बन जाओं  जेब
और बना ले अन्धेरें में अपना -अपना आयतन
या तुम मैदान बन जाओं
 धावक  .......
और मैं अंत तक दौड़ता रहूँ तुम्हारी शिराओं में
या तुम धुप बन जाओं और मैं हवा
जिससे सदी के अंत तक बना रहे हमारा स्पर्श .......
चाहे अयोध्या काबा रहे या न रहे
चलो मैं पतीली बन जाता हूँ  आंच .......

Sunday, 24 August 2014

मैंने अपने चेहरे  की हत्या नहीं की हैं
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अक्सर लोग अपने चेहरे की हत्या करके
जीने का एक प्रमाण देते हैं
लेकिन ! मैंने अपने चेहरे  की हत्या कभी नहीं की
यह अलग बात हैं कि ज़माने के साथ रहते हुए
मैं भूल गया अपना ही चेहरा
कई बार दुनिया को जानने के लिए
जरूरी होता हैं अपना चेहरा भूलना
दुनिया के साथ रहते हुए कभी - कभी मुझे याद आता था
मेरा चेहरा कैसा हैं ?
लेकिन ! लोगो छोटी -छोटी खुशियों के आगे
मुझे ध्यान ही नहीं रहता था अपना चेहरा की
मैं देखने मैं काला  हूँ या गोरा ।
एक समय बाद हम अपने जीवन के फलसफों की हत्या करके
बना लेते हैं अपने ऊपर एक चेहरा
नहीं तो जब डोमा जी उस्ताद जब पैदा हुआ था तो उसका भी चेहरा ठीक मेरे ही जैसा था
एक समय के बाद लोग बदल लेते हैं अपनी हुलिया
जब भी कभी कोई मुझसे पूछता हैं
तुम्हारा चेहरा कैसा हैं ?
तो मैं यही बताता हूँ
चौराहे पर खड़े मजदुर जैसा
एक लाचार बच्चे जैसा
कभी -कभी मेरा चेहरा भूख जैसा भी हो जाता हैं
मुझे अब शर्मिंदा नहीं होती हैं
अपने चेहरे पर
क्योकि इस चेहरे पर
अभी भी वह लिखती हैं
अपना सपना ॥

Sunday, 1 June 2014

सोनाडीह के मेले से लौटते हुए

सोनाडीह मेले में
नहीं दिखाई दी
गुड की जलेबी 
न ही सील -बट्टे की दुकान
इस बार में नहीं आई थी लड़कियां
महिलाएं/  बच्चे ।
जबकि इस बार मेले में पूरा बाजार आया हुआ था
लेकिन ! मेले में नहीं थी कोई ऐसी आँख
या नहीं था कोई ऐसा हाथ
जो मेला का इंतजार कर रहा था
सूरज का एक साल से रंग देखकर
मेले में नहीं दिखाई दिया जोकर
जिसके कहानी साल भर गांव में सुनाई देती थी
मैं मेले में धूल की दीवार पार करते हुए
काफी आगे तक गया
पर नहीं दिखाई दिया मेले में
मेरा अपना खोया हुआ बचपन
और न ही वह आम का पेड़
जो बारहो महीने
देता था सबको छाँव
मेले में था कोई तो
सिर्फ  भगवती की तीन मूर्तियां
और हजारो भक्त
पर नहीं था मेले में कोई ऐसा
जो पत्थर की मूर्तियों को माँ की नज़र से देख सके । ।

Saturday, 31 May 2014

बनारस में एक कुत्ते का होना जरूरी हैं

बनारस में
अगर एक कुत्ता होता
अजनबियों की पहचान करना
सरल होता .......
कभी -कभी एक
कुत्ते का होना जरूरी हो जाता हैं
और बची रहती हैं
लोगों की अपनी भाषाएँ ।
एक कुत्ते का एक शहर में होना
इस बात को प्रमाणित करता है
यहाँ अभी भी लोग जिन्दा हैं
एक शहर में एक कुत्ते के होने से
सुरक्षित रहती हैं
लड़कियां ।
जब तक शहर में कुत्ते रहते हैं
चौराहे पर नहीं दिखाई देता हैं
कोई बाहरी व्यक्तित्व और विचार
कुत्ते पहचान लेते हैं
समय की हत्या करने वाले हाथों को
कुत्ते पहचान लेते हैं
हत्यारे की आँख में छुपे हुए सपनों को
एक कुत्ता भक्त से पहले पहचान लेता हैं भगवान को
यदि बनारस में एक कुत्ता होता
बनारस से कुरुक्षेत्र के लिए कोई रास्ता नहीं बनता
कुत्ते चले गए
चली गई गलियों की रौनक
कुत्ते होते तो बचा रहता
यहाँ पर विवेक
बचा रहता बसंत
और एक आदमी के साथ कुत्ते भी दिखाई देते
शव यात्रा में । ।