Saturday, 16 March 2013

जीवन...

जीवन को मैनें सीप में से निकालकर 

सुबह --सुबह धूप में ......

एक खुसबू की तरह बिखेर दिया 

या फूलों /पत्तों में गूँथ दिया |

या गौरेया की आवाज में बांध दिया 

जीवन की यही निधि लिए

मैं अपने गुबार होते हुए दिल को

एक वृक्ष बना दिया

या कुदाल /हंसिया की एक धार बना दिया

या गोली /बारूद ,बम बना दिया

जो जीवन की हर लहर पर

अपनी दस्तक देता रहेगा |



नीतीश मिश्र 

माँ --एक

जब तक मैं, माँ के पास था 

उसके लिए मैं एक 

सोने का खिलौना था,

और जब मैं परदेश की और 

रुखसत किया तो ......

उसके लिए एक ...

दीवार बन गया,

अब ऐसे में वह मेरी इबादत हो गयी हैं

शहर भर में अब

जीतनी भी माँ दीखती हैं

सभी की शक्ल मेरी माँ

से मिलती--जुलती हैं

जब मैं अपनी आँखें बंद करता हूँ

तो एक ही ख्वाब दिखाई देता हैं

कि अभी भी मेरी माँ रात भर जागकर

मेरे लिए कोई अच्छा खिलौना बना रही हैं ||


नीतीश मिश्र 

इलाहाबाद के मनमोहन चौराहे पर

इलाहाबाद के मनमोहन चौराहे पर
रात के देखे हुए ख्वाबों को
सुबह की आँखों में बोलते /दौड़ते हुए
मैंने देखा हैं
कंकरीट के सैलाबों के बीच
और चाय की झीनी सी खुसबू में
ये शहर मुस्कराते हुए
फिरसे सूर्योदय की तरह
एक बार जिन्दा हो जाता हैं
और शहर की सड़कों की
रवानगी में तमाम उम्र की
संस्कृतियाँ अलकतरे की तरह फ़ैल कर
सबकी जिंदगी में एक तस्वीर की तरह जुड़ जाती हैं
चौराहे के एक कोने में
शब्बीर भाई :अपने आदम चहरे
केसाथ लोगों की
उदास /टूटी हुई जिंदगी को
सलीके से सीकर
फूल की तरह सजाकर
जिसकी जिंदगी उसी को सौंपकर
देश की दुर्दशा पर हंसकर रोते हैं
और सभी से ये कहते हैं
मैंने टूटी हुई जिंदगी को
एक आकार दिया और
एक गुमनाम व्यक्ति को
एक नाम और घर दिया और
बदले में दिल्ली से एक खबर आयी की
इलाहाबाद में एक देशद्रोही रहता हैं ।
शब्बीर की आँखें मेरे सामने खड़ी होकर
मुझसे पूछती हैं
भाई दिल्ली में अब किस तरह के लोग रहते हैं ।।

नीतीश मिश्र

ज्योति

अन्धेरें में
जब मनु ने
मेरा साथ
छोड़ दिया
और मेरा भय
भविष्य से भी
ज्यादा भयाक्रांत हो गया
वर्तमान इतना ही था मेरे पास
जितना मेरे पास अपना नाम था
तब मुझे ज्योति मिली
वह भी बांसुरी में
मुझे यही लगा की यही मेरी अपनी
खोयी हुई संस्कृति हैं
यही मेरी व्यकतित्व की कोई अभिन्न परिभाषा हैं
और मैं अपने स्व को
अपने आसमान को
कभी ज्योति में
कभी एक बांसुरी में
देखता हूँ .............

नीतीश मिश्र

औरत उब चुकी हैं

औरत उब चुकी हैं
पुरुष के भूगोल से
एक दिन विस्फोट होगा
उसके सीने से .......
क्योकि धरती के सारे सच को
और सारे दुःख को
अपने अन्दर समेट कर
इतिहास को बचायी हुई हैं .........

नीतीश मिश्र 

नव वर्ष उस लड़की के लिए

नव वर्ष उस लड़की के लिए
जो दूब की तरह साँस ले रही हैं
चट्टानों के बीच ........
अपने देह से उबर कर
एक नए खजुराहो की खोज में जुटी हुई हैं।

नव वर्ष उस औरत के लिए
जो वर्षों से पुरुष के पसीने से भींग रही हैं
बारिश से बचा लेती हैं खुद को
पर पसीने से जब भी लड़ना चाहती हैं
गाली/मार के आगे झुक जाती हैं।

नव वर्ष उस लड़के के लिए
जो अपनी माँ को कोहरे में
लगातार ढूंड रहा हैं
इस उम्मीद से की पूष की रात काटने के लिए
कम से कम एक स्वेटर उसके पास होता ........

नव वर्ष उस माँ के लिए
जिसने अपने बच्चे को गवां देने के बाद भी
उसकी याद को जिंदगी की एक दवा मानकर
खुद से लगातार लड़ रही हैं .............

नीतीश मिश्र

Friday, 15 March 2013

तुम्हारे बाद

मैंने,तुम्हारे बाद .....
अगर किसी को प्यार किया भी,
या तुम्हारें बाद अगर किसी के साथ 
सबसे अधिक वक्त गुजारा हैं तो ......
वह हैं मेरा बिस्तर।
ऐसा नहीं हैं कि ......
मेरा बिस्तर बहुत मुलायम हैं 
या मैं बहुत आलसी हूँ .......
जब भी बिस्तर पर होता हूँ तो 
लगता हैं कि मैं किसी हिमशिखर पर बैठा हूँ 
या समंदर के किनारे खड़ा हूँ
एक बात बिल्कुल साफ हैं
मैंने जितनी बातें पाठशाला में सीखी
उससे भी ज्यादा बातें मैंने
अपने बिस्तर पर ही सीखी हैं
जीतनी शांति लोगों को यश पाने के बाद मिलती हैं
उससे कहीं ज्यादा
मुझे अपने बिस्तर पर मिलती है।।।।

...........नीतीश मिश्र .............