Monday, 30 May 2016

मेरी खबर में


आज एक बच्चे की गेंद गायब हो गई
एक क्षण के लिए मुझे लगा की धरती गायब हो गई 
आज उसी बच्चे के पांव से जूता गायब हो गया 
मुझे लगा की मेरे दोनों पांव गायब हो गए
आज एक बच्चे का चेहरा गायब हो गया
मुझे लगा की अब शहर की नैतिकता मर चुकी है
आज एक बच्चे का बस्ता गायब हो गया
मुझे लगा की आज किसी ने मेरा दिल चुरा लिया
आज एक बच्चे का खिलौना गायब हो गया
मुझे लगा की मेरा विस्थापन हो गया।
आज मैं खबर लिख रहा था बचपन की
शहर में इसी बीच कोई मेरा प्रेमपत्र चुरा रहा था।।

मैं नहीं हूँ

मैं अपने शरीर में नहीं हूँ 
मैं जब भी अपना चेहरा खोजता हूँ 
मुझे अपने शरीर में 
इतिहास की कलाकृतियां मिलती है
जब सचेत होकर खोजता हूँ
तब मुझे नींद मिलती है
तब मुझे कुछ सपने मिलते है
कुछ दुःख मिलता है
कुछ असफलताएँ मिलती है
कुछ संभावनाएं मिलती है
लेकिन अपने शरीर में मुझे अपना चेहरा नहीं मिलता
बहुत मेहनत करता हूँ
तब थक कर यही कहता हूँ
मैं मुस्कान में भी हूँ
मैं दुःख में भी हूँ
मैं अतीत और भविष्य में हूँ
कभी कभी अपनी हार में भी अपनी ही विजय लिखनी होती है
शायद यह पहली हार थी धरती पर एक मनुष्य की।।

मैं नहीं हूँ

मैं अपने शरीर में नहीं हूँ 
मैं जब भी अपना चेहरा खोजता हूँ
मुझे अपने शरीर में 
इतिहास की कलाकृतियां मिलती है
जब सचेत होकर खोजता हूँ
तब मुझे नींद मिलती है
तब मुझे कुछ सपने मिलते है
कुछ दुःख मिलता है
कुछ असफलताएँ मिलती है
कुछ संभावनाएं मिलती है
लेकिन अपने शरीर में मुझे अपना चेहरा नहीं मिलता
बहुत मेहनत करता हूँ
तब थक कर यही कहता हूँ
मैं मुस्कान में भी हूँ
मैं दुःख में भी हूँ
मैं अतीत और भविष्य में हूँ
कभी कभी अपनी हार में भी अपनी ही विजय लिखनी होती है
शायद यह पहली हार थी धरती पर एक मनुष्य की।।
नीतीश मिश्र

मैंने महाकाल को रोते हुए देखा है

मैंने महाकाल को रोते हुए देखा है 
मैंने क्षिप्रा को प्रेमपत्र लिखते हुए देखा है 
मैंने उज्जैन को श्मशान में तब्दील होते हुए देखा है 
मैंने कालभैरव को देवदास बनते हुए देखा है 
मैंने चिंतामणि गणेश को कमजोर होते हुए देखा है 
मैंने भूखी माता को आमरण अनशन करते हुए देखा है
मैंने चौबीस खम्बा देवी को कैद होते हुए देखा है
मैंने गढ़ कालिका को पत्थर में शरण लेते हुए देखा है।
क्योंकि उज्जैन से हर समय रोते हुए स्त्रियां ही गई है
स्त्रियों के जाने के बाद
उनके लौटने की गरणा भी यही से शुरू हुई
लेकिन अफ़सोस वह स्त्रियां कभी नही लौटी।।

एक औरत बीज बो रही है

आज फिर एक औरत 
आँखों में उदासी लिए जा रही थी 
आज फिर एक बच्चा 
उम्मीद के गर्त में गिर गया 
और तुम चाँद को देखकर हँस रही थी 
मैं आसमान में टूटे हुए ख्वाबों को दफना रहा था।

एक औरत अपनी मरी हुई आत्मा के साथ 
नदी में बीज बो रही है 
एक बच्चा पतंग की तरह अपनी आत्मा को उड़ा रहा हैं 
एक भिखारी बिना आत्मा के हवा में हस्ताक्षर कर रहा है 
एक वैश्या लोगों की आत्मा को अनवरत पढ़ रही है 
एक मैं हूँ जो तुम्हारी आत्मा को लेकर
अपनी आत्मा की हत्या कर रहा हूँ।

सिग्रेट की डीबिया

सिग्रेट की डीबिया पर 
शाम को तुम्हारा नाम लिखा था 
रात को धुएं के साथ 
तुम्हारा नाम 
आसमान में अपना वजूद खोज रहा था 
अँधेरे में 
सिग्रेट की डीबिया पर 
रात भर तुम्हारा स्केच बनाता रहा 
सुबह जब नींद खुली 
तब सभी ख्वाब राख हो चुके थे 
और तुम्हारा स्केच भी गायब हो चूका था
ठीक वैसे ही जैसे तुम बिना बताएं
नदी के रास्ते चली गई थी।

पेड़ खड़ा है

पेड़ प्रेमिका की प्रतिक्षा में खड़ा है 
पत्तियो के आसरे सदियों से लिख रहा है 
प्रेमपत्र 
एक दिन जब पेड़ गिर जाएगा 
तब तुम्हें पता चलेगा 
की एक पेड़ धरती के अंदर भी ताजमहल बनाता था।।
नीतीश मिश्र