Friday, 11 September 2015

तुम तो सिर्फ व्याख्यान में थे

अब तुम लड़ाई नहीं लड़ पाओगें
लड़ाई के लिए रचोगे
सिर्फ स्वांग
और आख्यान
और करोगे अपने पुराने जंग पड़ गए इतिहास का प्रचार
जबकि तुम जानते हो
जब तुम पहली बार इस दिशा में आये थे
तभी भी तुम यही तख्तियां लेकर
हवा में मुक्का मारते थे
और भूख ओढ़कर
एक क्रांतिकारी की हैसियत से
आंदोलनों में भाग लेते
आज भी तुम्हारे साथी
वही गाना दोहराते
तुम लड़ाई में थे ही कब
तुम सिर्फ अपनी आवाज और अपनी पत्रिका में थे ।
और आज भी
तुम्हारे बाद
कई साथी उन्हें मिल गए
जो तख्तियां लेकर खड़े हैं
उन्हें मालूम नही हैं
पूरब दिशा का पता ।
तुम लड़ाई में आये ही कब
तुम तो सिर्फ व्याख्यान में थे ।।

हम दूर-दूर तक लड़ाई में नहीं हैं

हम दूर-दूर तक लड़ाई में नहीं हैं
हमारे ही साथी
हथियारों के बेंट बनकर
उनके हाथों का शोभा बने हुए हैं
उसके बावजूद भी हम चिल्ला रहे हैं कि हमारी लड़ाई जारी हैं
"हमारी लड़ाई जारी हैं"
अब यह एक दृष्टि नहीं
बल्कि यह भ्रम से रंगा हुआ एक कथन भर हैं
हमारे बुजुर्ग भी
अब लाल कुर्ता पहनना शुरू कर दिए हैं
हमारे विचारक भी अब सुरक्षित
जीवन की खोज में अन्वेषण कर रहे हैं
हम मरे हुए सपने हैं
और उनकी ताबूत में बंद हैं
वो हमे जिन्दा करने के लिए
युद्ध मैदान के किनारे से एक आवाज लगाते हैं हमारी लड़ाई जारी हैं ।।

तुम कहां हो भाई!

तुम कहां हो भाई!
अब वो लोग हिंदी में सपना देखना शुरू कर दिए
जबकि तुम हिंदी- हिंदी करते- करते मर गए
तुम तो हिंदी में उसी दिन मर गए थे
जब महानगर में प्रेमपत्र लिख रहे थे
तुम कहां हो भाई
जब हिंदी वो लोग बोलेंगे
जो हिंदी में रो नहीं सकते
जो हिंदी में गाली नहीं दे सकते
जो हिंदी में प्यार नहीं कर सकते
तुम कहां हो भाई
समाजवाद के पीछे तो नहीं भाग रहे हो,
तुम्हारे समाजवाद से भी हिंदी गायब हो चुकी है
तुम्हारे धर्म से भी हिंदी गायब हो चुकी है
तुम्हारे देवता भी नहीं सुन रहे है हिंदी में प्रार्थना
तुम बस जाने जाओंगे
वह भी तब जब तुम मर जाओंगे
या मार दिए जाओंगे
तब दिखाई देंगे
हिंदी के गिद्ध आसमान में उड़ते हुए
और लोकतंत्र के नाम पर मनाएंगे
तुम्हारे मौत का उत्सव
और फिर चले जाएंगे लोकतंत्र को बचाने
कहां हो भाई
दिल्ली के मोर्च पर
या अयोध्या के बियाबान में भटक रहे हो।।
नीतीश मिश्र

हम दुःखी थे

हम दुःखी थे
तभी यह धरती हमे विरासत में मिली
और आज भी हम दुःखी हैं
जब हमसे हमारी विरासत छीनी जा रही हैं
आज हमारे पास विरासत के नाम पर
चन्द पन्नों का इतिहास हैं
और चन्द कुछ ऐसे चेहरे हैं
जिन्हें हम अपनी परछाई बनाने में लगे हुए हैं
हम हारे हुए लोग हैं
और हारे हुए का कोई चेहरा नहीं होता ।।
नीतीश मिश्र
हम पहली बार पन्द्रह अगस्त को हारे थे
दूसरी बार इमरजेंसी के समय
तीसरी बार अयोध्या में
और चौथी बार
चौदह मई 2014 को
और पांचवी बार
दस सितंबर को
हम अब लिखेगें
सिर्फ अपने हारने की तिथि।।
नीतीश मिश्र

हम ठहरे हुए लोग हैं

हम ठहरे हुए लोग हैं
हम कभी लड़ाई में थे ही नहीं
हम लोग तो विचारों का पर्दा लेकर चलने वालों में से हैं
हम जिए कम बोलते रहे ज्यादा
उधर हत्यारा
खरगोश के साथ दौड़ रहा था
उसकी आवाज से सागर भी कांपता था
हमे यह सब मालूम था
फिर भी हम
धूप के खिलाफ खड़े नहीं हुए
हम लोग ठहरे हुए लोग हैं
इसलिए हम बस
मौत का मातम मनाना जानते हैं।
हम लोग ठहरे हुए हैं।।
नीतीश मिश्र

Monday, 7 September 2015

बच्चे जब भूख से खुश होते है

जहां बच्चे भूल चुके है दूध का स्वाद
बच्चे सपनों में बना रहे है
कपड़े के लिए एक प्रस्ताव....
मां अंधेरे की शिला पर बैठकर बुन रही है
स्मृतियों का एक रंग- बिरंगा स्वेटर
जिससे उसकी आत्मा कुछ - कुछ गर्म हो सके
बच्चे पेड़ों के पास खड़ा होकर पूछते है-
क्या तुम कभी फलते थे?
हम तो जबसे देख रहे है तुम ठूंठ की तरह उदास हो।
बच्चे जब भूख से खुश होते है
तब कढ़ाई में भरते है
थोड़ी सी धूप और थोड़ी सी हवा
और इस कदर खूश होते है
जैसे उन्होंने आसमान को पा लिया हो।

नीतीश मिश्र