Wednesday, 22 April 2015

रात अब चुप -चाप आती हैं

रात अब चुप -चाप आती हैं
और सिरहाने बैठ जाती हैं
और सुनने लगती हैं मेरे जिस्म से निकलती हुई आवाज़ को
चाँद पूरी रात
अपनी रोशनी पर पहरेदारी करता हैं
और मेरी आँखो से सपने निकलकर
दूधिया रोशनी मे जुगनू की तरह आँखमिचोली करने लगते हैं
ऐसे मे सुनाई देती हैं
बकरियो की मिमियाती हुई आवाज़
जो बताती हैं
दिन भर की दास्तां की किस झाड़ी में कब किस बच्चे की पतंग फँस गई थी
तभी नीले गुंबद से आसमान को देता हैं कोई आवाज़
मानो धरती से कोई बुला रहा हैं
बादलो मे छुपे हुए चेहरो को
ऐसे में कब आँगन मे एक हल्की सी धूप उतर जाती हैं
और मैं आसमान से लेकर एक ख्वाब चल पड़ता हूँ मैदान की और ||

नीतीश मिश्र

समय क्या तुम बता सकते हो

समय क्या तुम बता सकते हो
आज मेरे जूते पहले की तरह क्यो नहीं सुंदर हैं?
जबकि जूता लेते वक्त समय ही साक्षी था
समय क्या तुम बता सकते हो
आज नदियाँ क्यो नहीं सुंदर हैं
जबकि मैं नदी से जब पहली बार मिला था
तब नदी ने ही कहा था
मैं तुम्हारे अंत से के बाद ही मरूँगी
जबकि आज मैं जिंदा हूँ
और नदी बीमार ....
समय क्या तुम बता सकते हो
एक घर समय रहते ही खंडहर मे बदल जाता हैं जबकि एक मूर्ति समय के बाद भी जिंदा रहती हैं ||

समय अब तुम्हे बताना होगा
मेरे जूते आज क्यो नहीं सुंदर हैं ||
नीतीश मिश्र

बचे हुए दिनो में देखने को मिल सकता हैं प्यार

क्या इन बचे हुए दिनो में
देखने को मिल सकता हैं
एक भिखमंगे को मिल गई अपनी मंज़िल
या एक बौने ने
धरती के किसी कोने मे लिख दिया हैं अपना प्यार
क्या बचे हुए दिनो मे सुना जा सकता हैं
दादी की वह आवाज़
जिसे घर के दरवाजे भी सुनकर डरते थे
क्या बचे हुए दिनो में कभी लौटकर आएगा डाकिया
और सुनाएगा बाबूजी का अब वेतन बढ़ गया हैं
क्या बचे हुए दिनो मे देखने को मिलेगा
गाँव मे कोई नया बगीचा तैयार हो रहा हैं
क्या बचे हुए दिनो में हम केवल अयोध्या की डरावनी कहानी सुनेंगे ||
क्या हमने इसलिए अपने दिन हिफ़ाज़त से बचाकर रखे हुए थे ||

नीतीश मिश्र

आज शहर बहुत उदास हैं


आज शहर बहुत उदास हैं
शहर की गलियों में फैल चुकी हैं गंदगी
मकानों पर बन रहा हैं गुंबद जालो का
शहर खो रहा हैं
धीरे धीरे अपना स्वाद ....
और मैला हो रहा हैं
शहर का इतिहास ....
शहर की आत्मा धीरे धीरे फटने लगी हैं कई जगह से ...
शहर के होशियार लोग हो रहे हैं नपुंसक....
बच्चे बनते जा रहे हैं बहुरुपिया
धीरे -धीरे शहर के उपर का चमकता हुआ सूरज डूब रहा हैं
शहर के देवता मंदिरों से कर रहे हैं पलायन ....
लड़कियो ने बंद कर दिया हैं जाना स्कूल
नदियो मे नहीं उतरती हैं अब नाँव
आसमान मे कोई नहीं देख रहा हैं इंद्रधनुष
शहर से जा रहे हैं एक एक करके सब फ़क़ीर ....
शहर से ख़त्म होती जा रही हैं प्रेम कहानियाँ ....
अब दूसरे शहर से नहीं आते हैं यहाँ पर जानवर
अब शहर के देह पर नहीं उतरता हैं कोई अंधेरा ....
क्योकि शहर मे रो रही हैं लड़कियाँ ....
लड़कियाँ बंद हैं सदियो से हुकूमत के रंग में
शहर उदास हैं ....
क्योकि शहर मे रहने वाली लड़कियाँ
वर्षो से उदास हैं
इसलिए शहर अब मर रहा हैं
क्या किसी को मालूम हैं
यह शहर अब बीमार हो चुका हैं ||

नीतीश मिश्र

सड़्क पर आदमी सोया हैं

सड़्क पर एक आदमी ऐसे सोया हैं
जैसे वह सोते _सोते आकाश में कुछ खोज रहा हैं
वह खोज सकता हैं कुछ चिल्लर पैसे
या पतंग
या घायलो का पता
सड़्क पर सोया आदमी घंटो से करवट नहीं लिया हैं
वह आकाश को बताना चाहता हैं
इंसानो के फिदरत मे नहीं होता हैं करवट बदलना
वह सोए -सोए एक दिन ऐसे गुम हो जाएगा
जैसे गुम हो जाते हैं
हमारे जेहन मे रखे हुए शब्द
सड़्क पर सोए हुए आदमी को नहीं चिंता हैं
कि उसे ऐसे मे देखकर लोग क्या सोचेंगे
या हवा या धूप क्या सोचेगी
सड़्क पर सोया हुआ आदमी कभी -कभी आँखे उठाकर देखता ज़रूर हैं
पर उसकी आँखो मे नहीं बनती किसी की तस्वीर
गोया आदमी के साथ -साथ आदमी की आँखे भी अब विश्वास करना छोड़ दी हैं
सड़्क पर सोया आदमी एक दिन खो जाएगा
और वहाँ पर रहेगी कुछ रिक्तता जिसे
समय भी नहीं भर पाएगा
बहुत होगा तो कभी एक बच्चा इस जगह से गुजरेगा
और उसे सुनाई देगी सोए हुए आदमी की आवाज़
और बच्चा एक बार फिर खड़ा होगा सोए हुए आदमी को खोजने के लिए
बच्चा जब खोजकर थक जाएगा
और नहीं पाएगा कहीं सोए हुए आदमी को
तब बच्चा लिखेगा एक कविता ||

नीतीश मिश्र

वह बना रही है अपने लिए जगह


उसे मालूम है
भले से वह खिड़कियों के बीच से
देख रही रंगों को
उसे मिलना है एक बार कम से कम एक बार
धूले हुए आकाश से
रंगी हुई हवा से
आस्था से युक्त मंदिरों की मूर्तियों से
इसलिए वह बना रही है अपने लिए एक जगह
और साफ कर रही है आसमान को
हवा को
फूलों को
दरिया को
वह उड़ना चाहती है
और फर्क महशूस करना चाहती है
खुली हवाओं और कमरों के बीच बंद हवाओं के बीच
वह फर्क महशूस करना चाहती है
घर के पानी और नदी के पानी के बीच
वह देखना चाहती है
अयोध्या और गुजरात की मिट्टियों को
वह देखना चाहती है अलीगढ़ और बनारस की रात में भला क्या फ र्क होता है।
वह देखना चाहती है
क्या सचमुच में रात को दिल्ली का रंग डाइनों की तरह हो जाती है
वह देखना चाहती है
खादी के भीतर आत्मा रहती है या किसी का शरीर
इसलिए वह जगह बना रही है
जिससे वह उड़ सके
और बता सके
कि सागर के किनारे जो धरती खाली है वह भी सागर के विरूद्ध जेहाद करना चाहती है।।
नीतीश मिश्र

अभी बचा हुआ हैं शहर


अभी बचा हुआ हैं शहर
और आगे भी बचा रहेगा ....
क्योंकि अभी -अभी
मैंने शहर मे देखा हैं
छत पर एक लड़की को हँसते हुए ...
एक लड़की का हँसना बहुत ही शगुन भरा होता हैं
वह भी उस समय जब शहर की दीवारो पर अंधेरे का कब्जा हो
और शिकारी निकल पड़े हैं शिकार करने
ऐसे मे जब शहर मे तमाम कवि
अपनी कायरता को ओढकर लिख रहे हैं कविता
पंडित भविष्य के नाम पर लूट रहे हैं
डॉक्टर बीमारी का बहाना बनाकर
कर रहा हैं आत्मा की हत्या ....
ऐसे मे जब एक लड़की हँसती हैं
तो यही लगता हैं की अभी शहर मे फिरसे जलेगा एक चूल्हा
और
तैयार होगा एक मोची
और बनाएगा आदमी के पाँव के नाप का जूता ||

नीतीश मिश्र