Wednesday, 22 April 2015

बचे हुए दिनो में देखने को मिल सकता हैं प्यार

क्या इन बचे हुए दिनो में
देखने को मिल सकता हैं
एक भिखमंगे को मिल गई अपनी मंज़िल
या एक बौने ने
धरती के किसी कोने मे लिख दिया हैं अपना प्यार
क्या बचे हुए दिनो मे सुना जा सकता हैं
दादी की वह आवाज़
जिसे घर के दरवाजे भी सुनकर डरते थे
क्या बचे हुए दिनो में कभी लौटकर आएगा डाकिया
और सुनाएगा बाबूजी का अब वेतन बढ़ गया हैं
क्या बचे हुए दिनो मे देखने को मिलेगा
गाँव मे कोई नया बगीचा तैयार हो रहा हैं
क्या बचे हुए दिनो में हम केवल अयोध्या की डरावनी कहानी सुनेंगे ||
क्या हमने इसलिए अपने दिन हिफ़ाज़त से बचाकर रखे हुए थे ||

नीतीश मिश्र

आज शहर बहुत उदास हैं


आज शहर बहुत उदास हैं
शहर की गलियों में फैल चुकी हैं गंदगी
मकानों पर बन रहा हैं गुंबद जालो का
शहर खो रहा हैं
धीरे धीरे अपना स्वाद ....
और मैला हो रहा हैं
शहर का इतिहास ....
शहर की आत्मा धीरे धीरे फटने लगी हैं कई जगह से ...
शहर के होशियार लोग हो रहे हैं नपुंसक....
बच्चे बनते जा रहे हैं बहुरुपिया
धीरे -धीरे शहर के उपर का चमकता हुआ सूरज डूब रहा हैं
शहर के देवता मंदिरों से कर रहे हैं पलायन ....
लड़कियो ने बंद कर दिया हैं जाना स्कूल
नदियो मे नहीं उतरती हैं अब नाँव
आसमान मे कोई नहीं देख रहा हैं इंद्रधनुष
शहर से जा रहे हैं एक एक करके सब फ़क़ीर ....
शहर से ख़त्म होती जा रही हैं प्रेम कहानियाँ ....
अब दूसरे शहर से नहीं आते हैं यहाँ पर जानवर
अब शहर के देह पर नहीं उतरता हैं कोई अंधेरा ....
क्योकि शहर मे रो रही हैं लड़कियाँ ....
लड़कियाँ बंद हैं सदियो से हुकूमत के रंग में
शहर उदास हैं ....
क्योकि शहर मे रहने वाली लड़कियाँ
वर्षो से उदास हैं
इसलिए शहर अब मर रहा हैं
क्या किसी को मालूम हैं
यह शहर अब बीमार हो चुका हैं ||

नीतीश मिश्र

सड़्क पर आदमी सोया हैं

सड़्क पर एक आदमी ऐसे सोया हैं
जैसे वह सोते _सोते आकाश में कुछ खोज रहा हैं
वह खोज सकता हैं कुछ चिल्लर पैसे
या पतंग
या घायलो का पता
सड़्क पर सोया आदमी घंटो से करवट नहीं लिया हैं
वह आकाश को बताना चाहता हैं
इंसानो के फिदरत मे नहीं होता हैं करवट बदलना
वह सोए -सोए एक दिन ऐसे गुम हो जाएगा
जैसे गुम हो जाते हैं
हमारे जेहन मे रखे हुए शब्द
सड़्क पर सोए हुए आदमी को नहीं चिंता हैं
कि उसे ऐसे मे देखकर लोग क्या सोचेंगे
या हवा या धूप क्या सोचेगी
सड़्क पर सोया हुआ आदमी कभी -कभी आँखे उठाकर देखता ज़रूर हैं
पर उसकी आँखो मे नहीं बनती किसी की तस्वीर
गोया आदमी के साथ -साथ आदमी की आँखे भी अब विश्वास करना छोड़ दी हैं
सड़्क पर सोया आदमी एक दिन खो जाएगा
और वहाँ पर रहेगी कुछ रिक्तता जिसे
समय भी नहीं भर पाएगा
बहुत होगा तो कभी एक बच्चा इस जगह से गुजरेगा
और उसे सुनाई देगी सोए हुए आदमी की आवाज़
और बच्चा एक बार फिर खड़ा होगा सोए हुए आदमी को खोजने के लिए
बच्चा जब खोजकर थक जाएगा
और नहीं पाएगा कहीं सोए हुए आदमी को
तब बच्चा लिखेगा एक कविता ||

नीतीश मिश्र

वह बना रही है अपने लिए जगह


उसे मालूम है
भले से वह खिड़कियों के बीच से
देख रही रंगों को
उसे मिलना है एक बार कम से कम एक बार
धूले हुए आकाश से
रंगी हुई हवा से
आस्था से युक्त मंदिरों की मूर्तियों से
इसलिए वह बना रही है अपने लिए एक जगह
और साफ कर रही है आसमान को
हवा को
फूलों को
दरिया को
वह उड़ना चाहती है
और फर्क महशूस करना चाहती है
खुली हवाओं और कमरों के बीच बंद हवाओं के बीच
वह फर्क महशूस करना चाहती है
घर के पानी और नदी के पानी के बीच
वह देखना चाहती है
अयोध्या और गुजरात की मिट्टियों को
वह देखना चाहती है अलीगढ़ और बनारस की रात में भला क्या फ र्क होता है।
वह देखना चाहती है
क्या सचमुच में रात को दिल्ली का रंग डाइनों की तरह हो जाती है
वह देखना चाहती है
खादी के भीतर आत्मा रहती है या किसी का शरीर
इसलिए वह जगह बना रही है
जिससे वह उड़ सके
और बता सके
कि सागर के किनारे जो धरती खाली है वह भी सागर के विरूद्ध जेहाद करना चाहती है।।
नीतीश मिश्र

अभी बचा हुआ हैं शहर


अभी बचा हुआ हैं शहर
और आगे भी बचा रहेगा ....
क्योंकि अभी -अभी
मैंने शहर मे देखा हैं
छत पर एक लड़की को हँसते हुए ...
एक लड़की का हँसना बहुत ही शगुन भरा होता हैं
वह भी उस समय जब शहर की दीवारो पर अंधेरे का कब्जा हो
और शिकारी निकल पड़े हैं शिकार करने
ऐसे मे जब शहर मे तमाम कवि
अपनी कायरता को ओढकर लिख रहे हैं कविता
पंडित भविष्य के नाम पर लूट रहे हैं
डॉक्टर बीमारी का बहाना बनाकर
कर रहा हैं आत्मा की हत्या ....
ऐसे मे जब एक लड़की हँसती हैं
तो यही लगता हैं की अभी शहर मे फिरसे जलेगा एक चूल्हा
और
तैयार होगा एक मोची
और बनाएगा आदमी के पाँव के नाप का जूता ||

नीतीश मिश्र

Tuesday, 24 March 2015

सबसे बुरी खबर

संसार की
सबसे  बुरी खबर
आज मेरे सामने खड़ी थी ……
एक प्रेमपत्र का खो जाना
जैसे ही यह खबर मेरे पास आई
और मैं अंदर ही अंदर हंसने लगा
यह सोचकर
कि वह व्यक्ति तो मर गया होगा
जब उसे मालूम हुआ होगा
की चोरी में किसी ने प्रेमपत्र को भी चुरा लिया। ।
प्रेमी रात भर शहर के सभी प्रमुख चौराहों पर घूमता रहा
और देखता रहा
सड़क पर पड़े हुए
तमाम कागजो के टुकड़े को
इस उम्मीद से कहीं मिल जाये उसे अपना प्रेमपत्र
लेकिन नहीं मिला !
थक हारकर वह रोने लगा
और कहने लगा
की जब इस दुनिया का इतिहास लिखा जायेगा तो
क्या कहीं दर्ज किया जायेगा इस घटना को ?
एका -एक वह अँधेरे की दीवार को उठाता हुआ मेरे पास आया
और कहने लगा
मैं बहुत बीमार हूँ
बहुत पूछने पर बताया
की खो गया हैं प्रेमपत्र
मुझे लगा आज के समय की यह सबसे  बुरी खबर हैं ॥

Saturday, 21 March 2015

आभासी दुनिया में रहते हुए हम भूल रहे हैं प्यार करने की ताकत

आभासी दुनिया में रहते हुए
हम सिर्फ आभासी बनकर रह जाएंगे
और एक दिन ……
हमारे पास नहीं बचेगी
प्यार करने की ताक़त
एक दिन ख़त्म हो जाएगी
प्रेमपत्र लिखने की आदत.…
एक दिन छीन लेंगें वे
हमसे रोने की प्रवृत्ति ....
बुनी  जा रही हैं हमारे चारो और ऐसी साजिश
की हम भूल जाएँ
अपने पड़ोस में रहने वाले अब्दुल चाचा को
हम भूल जाये
दीनानाथ दर्जी  को
हम भूल जाये गांव के मजदूरो को
हम आभासी दुनिया में
बचे रहेंगे
सिर्फ आभासी संवाद करने लायक
और वे हमारे यहाँ आएंगे
और छीन लेंगे हमसे
हमारा कुंवा
हमसे हमारा त्यौहार
और हुनर
और घोषित कर देंगे
हिंदुस्तान फिर गुलाम हो गया ....
यदि हमको बचाना हैं कुछ
तो हमें मिटटी के दर्द को पहचानना होगा ।
और हर आदमी के चेहरे में अपना चेहरा खोजना पड़ेगा
और लिखना होगा प्रेमपत्र
नहीं तो
हम अपनी आत्मा की कोठरी में बैठकर
जलाएंगे एक दिया
और खोजेंगे अंधेरें में एक संभावना
और लिखेगें मृत्यु पर शोक गीत ॥

नीतीश मिश्र