Sunday, 10 March 2013

कब्रिस्तान में एक लड़की

कब्रिस्तान में
एक लड़की के लिए
इतना आसान  नहीं हैं
प्यार करना ।

वहाँ भी
हिंदू /मुसलमान की
गन्दी बू फैली हुई हैं

वहाँ भी मंदिर /मस्जिद कि
मंडियां सजी हुई हैं
वहाँ भी
सुबह --शाम दंगा  होने का
आसार बना रहता हैं।

वहाँ भी
माँ, अपने बच्चों को
अपने वश में करने के लिए
दंगों की कहानियाँ
सुनाती हैं

वहाँ भी बच्चे बटे हुए हैं
जातियों के खतरनाक समूह में
वहाँ भी युवाओं को
धर्म के नाम पर
गुमराह किया जाता हैं
ऐसे में
कब्रिस्तान में
जवान लड़कियां
प्यार को
एक बीमारी समझती हैं
और अपने तन से
आती हुई
खुशबू से बेहोश होकर
मछलियों की तरह
आँगन में
वर्षों से तड़प रही हैं।

लेकिन लड़को को छूट हैं
प्यार करने के लिए
और कभी --कभी
बलात्कार करने के लिए
कब्रिस्तान में
एक लड़की के लिए
इतना आसान नहीं होता हैं प्यार करना । ।


नीतीश मिश्र

Saturday, 9 March 2013

कब्रिस्तान में प्रेमपत्र

कब्रिस्तान में
सभी आत्माएं
धरती से
अपने साथ
कुछ न कुछ
सामान लेकर जरूर गयी थी।

कोई हीरा लेकर गया था
कोई सोना --चाँदी
और कोई रूपया
लेकर गया था ...

कब्रिस्तान में एक ऐसी आत्मा थी
जो धरती से
अपने साथ
अपना प्रेम -पत्र लेकर गयी थी

सोना चाँदी को
यमराज ने छीन लिया
यमराज ने जब पत्र को देखा तो
उसे शक हुआ
हो न हो
यह किसी न किसी खजाने का नक्शा हो
यमराज ने पत्र को
कुछ दिन अपने पास ही रखा
जब उसे प्रेम --पत्र का राज नहीं समझ में आया
तब उसने पत्र को
वहीँ कब्रिस्तान में छोड़ दिया

आज सभी आत्माएं प्रेम -पत्र को पढ़कर
कुछ देर के लिए खुद को मुक्तं समझती हैं
सभ्यता के अंतिम छोर पर
बचा रहेगा सिर्फ प्रेम -पत्र । ।

नीतीश मिश्र

कब्रिस्तान में हिजड़े

कब्रिस्तान /श्मशान जैसी
चौथी दुनियां को
मैं,लगातार देख रहा हूँ
और दावे के साथ कहता हूँ
पुनर्जन्म होता हैं
लेकिन हुलिया कभी नहीं बदलता हैं।

कब्रिस्तान में
सबसे अलग तरह की कब्र
हिजड़ों की होती हैं
क्योकि धरती पर
उनका जीवन भी
बहुत ही अलग तरह का होता हैं
शरीर में भी दो गुण
और आत्माओं में भी दो गुण
पर उनके दुखों में कोई गुण नहीं होता ।

कब्रिस्तान में भी
वे अशिक्षित और बेरोजगार हैं
जैसे --धरती पर
उनके पास कोई सुविधा नहीं थी
ठीक वैसे ही
कब्रिस्तान में भी
वे सुविधावों से वंचित हैं

कब्रिस्तान में भी
जातिवाद /पूंजीवाद का बोलबाला हैं
वहां भी उसी का चलता हैं
जिसकी धरती पर तूती बोलती थी

हिजड़ों की आत्माओं को नहीं मालूम हैं
भाई /बहन का क्या मतलब होता हैं
उन्हें ये भी नहीं मालूम हैं कि
गाँधी कब पैदा हुए थे
या अपना देश कब गुलाम हुआ था


उनकी आत्माएं बस
दिल्ली को पहचानती हैं
क्योकि दिल्ली ही
एक ऐसी जगह हैं
जो चौथी दुनियां में भी
अपना दखल रखती हैं
उनकी निगाह में दिल्ली
ईस्वर /यमराज दोनों हैं ।

मेरा दावा बिल्कुल सही हैं
पुनर्जन्म में
रूप /लिंग और सत्ते का परिवर्तन
बिल्कुल ही नहीं होता
क्योकि चौथी दुनियाँ की
रिपोर्ट मेरे पास हैं । ।


नीतीश मिश्र 

Friday, 8 March 2013

कब्रिस्तान में बौना

कब्रिस्तान में
सबसे छोटी कब्र
एक बौने की थी
और उसकी आत्मा भी
सबसे छोटी थी
क्योकि उसके जीवन में
उसे जो भी कुछ मिला
बस छोटा ही मिला ।
जैसे --पहनने के लिये सबसे
छोटे कपड़े
और सोने के लिए
सबसे छोटी चारपाई,

उसकी आत्मा पर
लोगों की हँसी की
एक बदबूदार दाग थी
जो जख्म से भी ज्यादा
कहीं गहरी थी
उसके लिए जीना और मरना
दोनों एक ही घटना थी
क्योकि एक बौना
गरीब आदमी से भी कहीं ज्यादा छोटा होता हैं।

लेकिन! कुछ मामलों में
वह बहुत ही धनी भी होता हैं
बौना,कभी भी सांप्रदायिक नहीं होता हैं
न ही कभी बलात्कार करता हैं
और न ही नेता बनने की फिराक में रहता हैं
लेकिन बौने की आत्मा को सबसे अधिक दुःख
इस बात का हैं कि लोग मरने के बाद भी
उसे बौना ही कहते हैं ॥

नीतीश मिश्र 

Tuesday, 5 March 2013

कब्रिस्तान

कब्रिस्तान को देखने
शहर से अब कोई नहीं आता
जबकि पता सभी को मालूम रहता हैं,
शहर,का सबसे खराब स्थान
कब्रिस्तान का ही होता हैं
क्योकि उसके पास
कोई सीधी आवाज नहीं होती हैं ।
बस्तियों के बीच
कहीं दूर
सैन्धव सभ्यता से भी अधिक समय से खामोश हैं
कब्रिस्तान,मुझे देखकर
कुछ देर के लिए हँसता हैं
शायद ! बहुत कुछ मेरा चेहरा
उसके चेहरे से मिलता जुलता हो
जब आदमी किसी काम का नहीं रह जाता हैं
तब वह कब्रिस्तान की यात्रा करता हैं।

कब्रिस्तान,आज सबसे अधिक दुखी हैं
क्योकि कोई भी जब भी आया
रोते हुए ही आया
कब्रिस्तान आज तक
नहीं देखा हैं किसी को भी हँसते हुए
वह नहीं देख पाया हैं
बच्चों को खिलौनों से कभी खेलते हुए
या किसी युगल को प्यार करते हुए
या किसी को चोरी करते हुए
कब्रिस्तान केवल
सदियों से एक ही आवाज को पहचानता हैं
आँसुओं और सिसकियों की ॥ 

Monday, 4 March 2013

कब्रिस्तान में स्त्रियाँ

मरने के बाद भी
स्त्रियाँ मुक्त नहीं होती
पुरुष पैदा होते ही
मुक्त घोषित कर दिया जाता हैं,
मरने के बाद भी
पुरुष,भूत /प्रेत के रूप में
व्यवस्था के पीछे
अपनी समानांतर सरकार चलाता हैं
कब्रिस्तान,में दफनाई गयी स्त्रियाँ खुश नहीं हैं।
पुरुष मुर्दे वहाँ भी
औरतों को गालियाँ  देते हैं
फब्तियां कसते हैं
और बलात्कार भी करते हैं,
क्योकि कब्रिस्तान में उन्हें नगें रखा जाता हैं
धरती पर, स्त्रियाँ कभी --कभी प्रेम कर लेती हैं
लेकिन यहाँ बस शिकार बनी रहती हैं
कब्रिस्तान में स्त्री के लिए कोई संविधान नहीं हैं
क्योकि ऊपर जो खुदा हैं
वह भी एक पुरुष ही हैं
ऐसे में स्त्रियाँ!
छोड़ देंगी ये दुनियाँ
और बनायेंगी
अपनी एक
अलग दुनियाँ
जहाँ आसमान के नीचे
वे एक बार प्यार कर सकें
और लिख सकें एक कविता
स्त्रियाँ अब धरती पर नहीं रहेंगी
बनायेंगी अपने लिए एक अलग दुनियाँ ॥॥

Saturday, 2 March 2013

आरिफ

जबसे बाबरी मस्जिद गिरी हैं
तभी से कायनात की धरती सुखी पड़ी हैं
 और तभी से हमारे यहाँ ध्वनि प्रदुषण बढ़ा  हैं
और तभी से आसमान के बादल सहम कर चलते हैं
हवाएं भी अब ठहर -ठहर कर बहती हैं
और तभी से मेरा दोस्त आरिफ क्रब में सो रहा हैं,
सभी इस बात को जानते हैं और मानते भी हैं
कि आरिफ अब मर चुका हैं,
लेकिन सिर्फ मैं ही इस बात को स्वीकारता हूँ
वह अब भी सो रहा हैं ।

क्योकि जब मस्जिद गिरी थी
और लोग खून से धरती के जिस्म को सींच रहे थे
तब हम और आरिफ
धरती पर लगे हुए धब्बों को धो रहे थे
और सोये हुए लोगों को जगा रहे थे
यह सोचकर कि
किसी तरह भी बच जाये उनके सपने
लेकिन इस अजायब दुनियां में
आदमी को छोड़कर
सभी को जिन्दा रहने का अधिकार हैं,
आरिफ,भी एक आदमी का चेहरा लिए
अपने सपनों के महक को सूंघ रहा था
लेकिन साम्प्रदायिकों की नज़रों ने
उसके देह के साथ बलात्कार कर बैठी 
उस दिन पूरे गाँव की आँख ने मान लिया
और अपने बहुत अन्दर से
उसके वजूद को बाहर निकालकर
घोषित कर दिया कि
आरिफ अब मर चुका हैं
लेकिन उस दिन भी जब हवा में नमाज़ गूंज रही थी
मैंने अपने बहुत भीतर सुना था कि आरिफ अब भी सो रहा हैं,
दुनियां में रोज लोग सोते हैं रोज लोग जागते हैं
ऐसे लोगों का सोना और जागना
बिल्कुल एक जैसा होता हैं ।
आरिफ,क्रब में सोते वक्त मुझसे कहा था कि
"तुम मेरी क्रब पर रोज आना
और अपनी प्रेम कहानी सुनाना
और एक पेड़ लगा देना"
वादे के मुताबिक मैंने एक पेड़ लगा दिया
और रोज शाम को जाकर
प्रेम पत्र पढ़कर सुना देता था
मेरी प्रेम कहानी सुनकर
वह कुछ देर के लिए जाग जाता था
और देर तक हँसता था
उसकी हँसी की रोशनी में
मेरे दुःख कम हो जाते थे
और मेरी आत्मा को एक नया विजन मिल जाता था,
लेकिन आरिफ रोज मुझसे एक ही बात कहता था
क्या मस्जिद के गिर जाने से
हिन्दुओं की दरिद्रता दूर हो गयी ?
या मुसलमान पहले की अपेक्षा और गरीब हो गये
या हिन्दू नेता लोग और विकसित हो गये
क्या मुसलमान नेताओं का पहले की तरह रोना अभी भी जारी हैं ॥
उसके किसी भी प्रश्न का जबाब मैं सही से नहीं दे पाता हूँ
क्योकि नब्बे के बाद जो दुनियां बन रही हैं
उसकी नीवं में आदमी ही दबाये गए हैं
और जिस दुनिया में आदमी की कोई कीमत नहीं होती
वह दुनियां एक दिन आदमखोर हो जाती हैं
और नब्बे के बाद की दुनियां
आदमी को मारने के साथ -साथ
पहाड़ /जंगल और नदी को भी मार रही हैं
मेरे चारों और कितनी दुसह हवा बह रही हैं
और मेरा दोस्त सो रहा हैं
जबकि मैं जागते हुए मर रहा हूँ ।
मुसलमान कुरान की आयतों से बाहर निकलकर
विस्फोटक सामग्री बन रहे हैं,
और हिंदू इमारतों को महाभारत की शक्ल देने में आमादा हैं,
जबकि आदमी बने रहने की
मैं सारी सीमाएं लाँघ चुका हूँ
आज मेरा हर ख्वाबं मुझ पर हँस रहा हैं
जबकि मेरे विरुद्ध साजिशों का फतवा जारी हैं ।

मेरे गाँव और शहर में
कोई नया अस्पताल या नया स्कूल नहीं बना
हाँ !लेकिन मस्जिद और मंदिर जरूर बन गए
आदमी अब स्त्री से प्रेम न करके
अपनी भूख से कर रहा हैं
और अपने जिस्म पर लाचारी को पहनकर
सूरज के खिलाफ चल रहा हैं,
और ऐसे में लालकिले से सुबह -शाम एक आवाज आती हैं
कि हिंदुस्तान आजाद हैं,
अब मैं, जब भी आरिफ की क्रब जाता हूँ
वह सोते हुए रोता रहता हैं
और मुझसे पूछता रहता हैं कि
इस दुनियां में तुम कब -तक ऐसे मरते रहोगे
और कब तक अपना पुराना प्रेम पत्र पढ़कर सुनाते रहोगे,
जबकि तुम्हे पता हैं कि
ये दुनियां तुम्हें तुम्हारा इश्क नहीं देगीं
ये दुनियां अगर कुछ देगीं तो सिर्फ मौत।

क्या यह सही नहीं हैं कि
आरिफ का क्रब में सोना
और मेरा जागते हुए मरना
दोनों घटनाओं का एक ही अर्थ हो
जबकि यह मुझे भी पता हैं कि हम इतिहास को नहीं बदल सकते हैं,
हम केवल इतना ही कर सकते हैं कि
वर्तमान के आईने पर इतिहास को थोप नहीं सकते
लेकिन यह आदमखोर दुनियां इतिहास क्या भूगोल को भी बदल सकती हैं,
अब आरिफ क्रब से
चिल्ला --चिल्ला कर मुझे बुलाता हैं
जब भी देश में कोई विस्फोट होता हैं,
वह मुझसे पूछता हैं ----
क्या अब दुनियां में ऐसे ही लोग रहेंगे
जो केवल दूसरों को मारकर अपने होने का प्रमाण देंगे,
फिर क्या अर्थ रह जाता हैं मेरा मुसलमान होने का और तुम्हारा हिन्दू होने का?.
आज स्थिति और भी भयंकर हो गयी
जब मैंने,अख़बार में यह खबर पढ़ी की
कलैक्टर ने कब्रिस्तान की जमीन किसी भूमाफिया को बेच दी,
अब आरिफ क्रब से बाहर आकर मेरी परछायी में समा गया हैं
मैं भी अब बहुत खुश हूँ
क्योकि मेरी मृत्यु का संस्कार अब हिन्दू रीति -रिवाज से नहीं होगा
मैं अब तो ना हिन्दू ना मुसलमान की जमात में शामिल हो गया ॥


नीतीश मिश्र